शहर में अकेला पलाश
वह चुपचाप छटपटाता है,
आये कोई;
ऐसे मुझे बुलाता है .
ज्ञान-मनोरंजन-व्याख्यान के बाद;
जब होता है थकान का प्रवेश मुझमें
तब मुड़ता हूँ उसकी ओर
उसकी फटी-छिछली पत्तियां
हवा के बगैर डोलने लगती है,
इधर-उधर; फिर टूटती; जाती है बिखर.
अच्छी तरह जानती है वो भी
डंठलों से बगावत का हश्र,
पर कहीं भाता है उनको टूटकर गिरना
कि उन जंग लगी, मटमैली, अधमरी सूखी पत्तियों को
शायद कोई उठाएगा,
फेंक देगा फिर भले उसे तोड़-मरोड़ कर,
पर कुछ पल ही सही, छू तो जायेगा.
उसके खुरदुरे जड़ और तने को जब मैं छूता हूँ,
तो, मोम सरीखा रक्त हाथों में पिघलता है,
कहता है कि मैं फटा हूँ; इसलिए कि
धमनियों में आग है जो, वह जला न दे मुझे भीतर
निकल आये बन मोम सा
पिघल जाये तेरी हथेलियों पर या इस धरा पर.
पूछता हूँ उससे मैं कि आ गया फागुन,पर तेरी डालियों में टेसू नहीं आये ?
कहता कि,
क्या करूँगा मैं अकेला फूलकर,
आ भी जाते फूल अगर
कौन है आता इधर, उठाता नज़र,
तुम भी तो आये अबर.
हैं अगल-बगल जो वृक्ष मेरे
वे भी हैं मुझसे बड़े
मैं मंझले आकार का, डंठलों को ओढ़कर
करता हूँ खुद में बसर,
मेरा नहीं है ये शहर.
हाँ, हैं तने में दो-चार खोंडर
रहते कुछ गिरगिट वहां छिपकर;
ढूंढो उन्हें, पूछो उन्हें
अब वे हैं मेरा खबर.
उन खोंडरों में देखना तुम गौर कर
सुख मिलेंगे,दुःख मिलेंगे,पूछे थे जो सवाल तुमने
उनके उत्तरों के संदूक मिलेंगे,
और थोड़ा तह तक जाना
वहीँ तुम्हें वह सिन्दूरी किंशुक मिलेंगे.
मैं फूलूँगा, मैं खिलूँगा, उम्रभर
पर अकेला खिलकर किसको मिलूँगा ?
हो तुम्हें गर देखना मुझमें है रंग
तो, ले चलो मुझे अपने संग, झारखण्ड.
~ विशेष चन्द्र ‘नमन’

Comments
Post a Comment