...उसे आज़ाद करता हूं।



ये कौन सी शाम है जहां शफ़क़ पर एक ओझल सी रोशनी है, जो थोड़ी दिखती भी है और थोड़ी बुझी- बुझी भी। दिल है इक, जिसे मालूम नहीं दिखने और बुझ जाने के बीच क्या है जिसमें वह अटक सा गया है। बचे हुए दिन अब इतने कम हैं कि अब उंगलियों पर गिन सकता हूं। कोई है, जो हरदम आंखों के कोर पर रहता है, एक बूंद पानी जितना, फूल की एक पंखुड़ी भर, लेकिन बहुत वज़नी। बहुत कुछ होने के बाद भी ऐसा लगता है कि कुछ है जो नहीं है, जैसे आसमान है, तारे नहीं, तारे हैं पर चांद नहीं। 

कोई आता है, बार- बार आता है, उम्मीद की तरह आता है। उसके आने से चली आती है एक खुशबू। उसके रंग से खिल जाता है मेरे मन का पलाश। उसके न होने पर भी उसकी तस्वीर की दमक चेहरे पर मुस्कान ले आती है, मैं पहले से ज़्यादा गीत गुनगुनाता हूं। उससे प्यार करता हूं, उसे आज़ाद करता हूं।

(डायरी)
०२- ०७- २०२५


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