चाँद से गुजारिश
ऐ चंदा !
आज रात तुम मत आनामेरी छत की मुंडेर पर
आज कोई नहीं देखेगा तुम्हे
जैसे पहले रोज़ निहारा करते थे
छत के ठन्डे फर्श के ऊपर टहल-टहल कर
और फोन पर घूम-घूम उससे बतियाकर
देख तुझे हम नजर उतारा करते थे .
पर तुम आज नहीं आना,क्यूंकि
तीन दिनों से सूरज भी तो छत पर
चाँद ही बनकर आया है ,
पता नहीं इस दिल्ली पर
किस आबो-हवा का साया है ?
अब कोई तेरे दर्शन को
छत पर शायद ही आयेगा
और आया अगर तो भी वह
तुझे ढूंढ न पायेगा.
अब तो पूरे शहर के ऊपर
जहरीली धुंध का साया है
पता नहीं इस दिल्ली ने
किस पाप का क़र्ज़ चुकाया है .
तीन दिनों से सूरज भी तो छत पर
चाँद ही बनकर आया है ,
पता नहीं इस दिल्ली पर
किस आबो-हवा का साया है ?
अब कोई तेरे दर्शन को
छत पर शायद ही आयेगा
और आया अगर तो भी वह
तुझे ढूंढ न पायेगा.
अब तो पूरे शहर के ऊपर
जहरीली धुंध का साया है
पता नहीं इस दिल्ली ने
किस पाप का क़र्ज़ चुकाया है .
ऐ चंदा !
तुम मत आना ,
इस जहरीली दुनिया में आकर
तुम भी गंदे हो जाओगे
इन धुन्धों से गुज़र-गुज़र तुम
अपनी शीतलता खो जाओगे ,
तुम मत आना ,
इस जहरीली दुनिया में आकर
तुम भी गंदे हो जाओगे
इन धुन्धों से गुज़र-गुज़र तुम
अपनी शीतलता खो जाओगे ,
जब हमारा दिल चाहेगा
की आज चाँद को देखूं मैं ;
तब कमरे की खिड़की खोल मैं
उस सूरज को तक लूँगा
और धुंध में आँख मींचकर
सच को झूठा कह दूंगा .
की आज चाँद को देखूं मैं ;
तब कमरे की खिड़की खोल मैं
उस सूरज को तक लूँगा
और धुंध में आँख मींचकर
सच को झूठा कह दूंगा .
तुम बस इतना करना चंदा
अपने कुछ साथी बादल को
बहला कर के ,फुसला कर के
इस धुंध भरी दिल्ली की ज़मीं पर
अमृत वर्षा करवा जाना ,
पर; आज रात तुम मत आना
ऐ चंदा !
आज रात तुम मत आना .
अपने कुछ साथी बादल को
बहला कर के ,फुसला कर के
इस धुंध भरी दिल्ली की ज़मीं पर
अमृत वर्षा करवा जाना ,
पर; आज रात तुम मत आना
ऐ चंदा !
आज रात तुम मत आना .
-विशेष


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