मेढ़





कल मैं आँसू-जल था
छोटी नदी के खारे पानी सा
छोटी मछलियों के पसीने से निकला
आज मैं ख़ालीपन का चित्र हूँ
पर्णहीन वृक्ष के सिहरन सा
एकांत बहती सूखी नदी की रेत सा


एक मेढ़ है, मुझे बांधती है- जोड़ती है
मैं बुझ भी जाता हूँ, वो मुझे कब छोड़ती है !!









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Vishesh 

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