अनुभव में स्थिरता





वह जमीन सूंघता था, जैसे वह खुद के लिए सुकून का कोई टुकड़ा ढूंढ रहा हो। कभी वह बहुत आगे निकल आता था, लेकिन उसके साथ कुछ ऐसा जुड़ा होता था कि वह फिर उसे पीछे खींच लेता था। हर बार किसी गहरे ख्याल के बाद उसे याद आता था कि वह जिंदा है। कुछ पल जिंदा रहने के बाद फिर से वह मोम हो जाता था और किसी सुनसान चिंतन की गर्माहट में बिना जले पिघलता था।

 जीवन कुछ दिनों से ऐसा ही चलता आ रहा था। कोई अनुभव था जो गहराता जा रहा था। वह खुद को कहीं रोक आया था, पर इस रुकावट में कहीं कोई दाब था जो प्रबल हो रहा था और गतिमान होकर मन में कोई पगडंडी बना रहा था, एक अदृश्य पगडंडी, जिससे उसे गुजरना था। वह समझने लगा था की जीवन के अनुभव में स्थिरता नहीं होती, एक पल खुद को रोकोगे तो दूसरे पल को दौड़ कर पकड़ना होगा।

                                                                                                                                              [ डायरी ]



विशेष 

Comments

Popular Posts