अंत - ठहराव - आरम्भ !!


हर रात बिस्तर पर जाने से पहले जब तुम अंतिम बल्ब को बुझाते हो, तो खत्म हो जाती है एक रोशनी, बुझ जाता है छोटा सूरज, सुबह अपनी विशालता में पुनः लौटने को।

लिखते- लिखते कोई कविता नहीं लिखी जाती और स्याही खत्म हो जाती है। क़िताबों के पन्ने खत्म होने को आते हैं पर कहानियां जैसे कहीं ठहर जाती हैं। खाना बनता ही रहता है और ईंधन ख़त्म हो जाती है। तुम्हें नींद में नहीं आते कोई सपने। सिनेमा देखते-देखते बीच से ही तुम्हारी दिलचस्पी ग़ायब हो जाती है।

किसी रोज़ तुम बीमार हो जाते हो और दवाएं नहीं मिलती। युद्ध, परीक्षाएं, संगीत, चुम्बन, चिट्ठी, कॉफ़ी, सूखे हुए कपड़े - यह सब एक दिन ख़त्म होते दिखते हैं। 

तुम उंगलियों पर चीज़ों को गिनते हो और गिनती ही ख़त्म हो जाती है।

चीजों का अंत होता है या वे ठहर जाती हैं कुछ वक्त को, दुबारा होने के लिए !

Comments

  1. दिल जब असमंजस में होता है तो हालातों की कश्मकश अंत-ठहराव-आरंभ को बेचैन बना ही देती है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular Posts