एक कूप की रचना प्रक्रिया
इन दिनों अपने गाँव में हूँ और बहुत नज़दीक से एक कुएं का निर्माण कार्य देख रहा हूँ। कूप निर्माण कोई एक रोज़ का कार्य नहीं है कि सोचा और बस हो गया। इसके बनने में ज़मीन के भीतर की गहराई भी है, तो ईंट - पत्थरों से बंधकर उठती एक ऊंचाई भी है।
अनुपम मिश्र जब अपनी कृति 'आज भी खरे हैं तालाब' में लिखते हैं - "सैकड़ों, हज़ारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की, यह इकाई, दहाई मिलकर सैंकड़ा, हज़ार बनती थी।" इन पंक्तियों की हूबहू पुनरावृत्ति इन दिनों कुएं के निर्माण में देख रहा हूँ।
ठीक जिस तरह किसी का लिखा कुछ सुंदर सदियों के लिए अमर हो जाता है, वैसे ही ये तालाब, बावड़ी, कुएं भी किसी खूबसूरत रचना से कतई कम नहीं हैं। दुनियावी इतिहास को गौर से देखें तो पाएंगे कि तमाम सभ्यताएँ पानी के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। और ख़ासकर तब; जब वर्तमान में जब भारत जैसी विशाल जनसंख्या एक भारी जलदबाव में जी रही है, जब देश का वाटर फुटप्रिंट्स वैश्विक औसत से भी नीचे जा चुका है, ऐसे में पानी के प्राकृतिक व मानव निर्मित संसाधनों की उपयोगिता और चिंता बेहद ज़रूरी है।
वैसे तो ऐसी कई ख़ाली जगह-ज़मीनें होती हैं, जहाँ खुदाई की जा सकती है, पर नहीं, चूंकि कुएं का निर्माण होना है, उद्देश्य पेयजल और सिंचाई का है, एक दूरगामी योजना है, इसलिए एक दूरदर्शी और पारखी निगाह ज़रूरी है।
तो सबसे पहला सवाल उठता है कि कुआं कहाँ बने ? इसके लिए ठीक जगह की पहचान ज़रूरी है, अनुभवी आंखें ही ऐसी जगह तय करती है जहां पानी का स्रोत आसानी से निकल आए। फिर आता है दूसरा प्रश्न कि निर्माण का समय क्या हो? चूंकि मिट्टी की गहरी कटाई होनी है, और बरसात में यह संभव नहीं होगा, इसलिए बरसात से पहले ही कुएं की खुदाई और बंधाई हो जानी चाहिए।
सब कुछ तय होने के बाद शुभ मुहूर्त और अच्छे लगन, नक्षत्र में भूमिपूजन के साथ शुरू होता है कूप निर्माण का कार्य। शुरू के कुछ दिनों में एक तय गोल घेरे में मिट्टी की कटाई होगी। हज़ारों डलवा मिट्टी काटना कोई आसान कार्य तो है नहीं। मिट्टी दिखती जितनी कच्ची है, उसे काटने में उतना ही पक्का बल लगता है, इस कार्य को पक्के,मेहनती और निष्ठावान मजदूर ही संभव बनाते हैं।
रोज़ सुबह जलपान के बाद मज़दूर फावड़े, कुदाल, गैंता लेकर जुट जाते हैं। उन्हें मिट्टी काटते हुए ज़मीन की गहराई में उतरना है, पुनः खोदी गई मिट्टी को कुएं से बाहर निकाल फेंकना है, इसके लिए एक मजबूत घिरनी और रस्सा चाहिए होगा। सूरज चढ़ रहा है, दिन के ग्यारह बज गए हैं, अब तक मजदूरों का काफ़ी पसीना बह चुका है। अब उन्हें गुड़, सत्तू, नामक और नींबू का शर्बत चाहिए। फिर एक बार वो काम पर जुट गए हैं। कुएं के दीवारों की बारीक कटाई होगी, ताकि मिट्टी धंसे नहीं।
कुछ गहराई तक खुदने के बाद कुएं से पानी का सोत निकल आया है, अब तो कटाई और भी मुश्किल होगी। पानी का सोता बेहद तेज़ है, कुएं से पानी निकालना होगा ताकि और गहरे तक कटाई संभव हो पाए। कुएं के बाहर पानी निकालने का मोटर लगाया जाता है। धीरे-धीरे कर के खुदाई का पूरा कार्य संभव हो पाता है।
अब बारी है कुएं की बंधाई की। इसके लिए कुएं के अंदर पत्थर उतारना होगा, पत्थर काफ़ी वज़नी है, कुछ तो तीन सौ किलो तक के हैं, यह सबसे मुश्किल और जेखिम भरा काम है। धीरे-धीरे उतारना होगा, रस्से मजबूत होने चाहिए और घिरनी को ध्यान से चलाना होगा। ध्यान रहे कि भीतर काम कर रहे मज़दूर पर ऊपर से कोई वस्तु न गिरे।
धीरे-धीरे पत्थर की ठोस दीवार की घेराई बनने लगती है। दीवार अपनी गोलाई के ऊपर चढ़ती है, मानो कोई गोल सीढ़ियों से पहाड़ चढ़ रहा हो।
हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई है। डर है कहीं मिट्टी धंसे नहीं। काम रुक गया है। अब मौसम की ताक देखकर काम करना होगा। आहिस्ता-आहिस्ता ऊपर उठना होगा।
अब दीवार पूरी तरह से ऊपर उठ चुकी है, सबकी मेहनत रंग लाई है, कुआं बनकर तैयार है, इस भूगोल पर एक नया वृत्त उभर आया है,पृथ्वी पर शून्य सी एक रचना अमर होने को खड़ी हो गई है। मिश्र जी के शब्दों में ही कहें तो - 'आज भी खरे हैं कुएं' ।
और अंत में आंग्ल-अमेरिकी कवि डब्ल्यू. एच. ऑडेन की यह कविता पंक्ति -
"हज़ारों लोग प्रेम के बिना रहते आए हैं,
पानी के बिना एक भी नहीं रहा।"
- Vishesh



Wow interesting piece of text
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